नागपुर-बनारस में BJP को करारा झटका, MLC चुनाव परिणामों का होगा दूरगामी असर

भारतीय जनता पार्टी इन दिनों सत्ता-सुख के शीर्ष पर है. उसके पास कुछ नेताओं का और मुद्दों का इस तरह का पारस पत्थर है जो किसी भी चुनाव को सोने में बदल रहा है. पिछले 6 वर्षों में मोदी-शाह की टीम अपने परिवार के मुखिया राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्षों पुराने एजेंडे को जिस बखूबी से लागू करवा रही है, उससे कार्यकर्ताओं को ऐसा लगने लगा है कि आगे दशकों तक पार्टी अपराजेय रहेगी. जैसे ही कार्यकर्ताओं में यह फीलिंग आती है, पार्टी को जनता सबक सिखा देती है. आरएसएस के मुख्यालय नागपुर में 50 वर्षों से ज्यादा विधान परिषद की जिस स्नातक निर्वाचन सीट पर सिर्फ और सिर्फ बीजेपी जीतती आई, वहां शुक्रवार को कांग्रेस ने धूल चटा दी.

उसी तरह जिस बनारस के भरोसे मोदी पूरे देश में परचम फैला रहे हैं, वहां के एमएलसी चुनाव में भी बीजेपी का उम्मीदवार पराजित होने के साथ-साथ तीसरे नंबर पर खिसक गया. हैदराबाद के पोस्टल वोटों की गिनती देखकर दक्षिण में एन्ट्री का ख्वाब तो कुछ ही घंटों बाद ध्वस्त हो गया. यह सभी परिणाम पार्टी को आगाह करने के लिए काफी हैं कि इतना उन्माद, अहंकार भी न किया जाए कि जनता अर्श से उतारकर फर्श पर ला पटके.

गडकरी ने किया था आगाह

29 नवंबर को नागपुर (Nagpur) में पार्टी के एकमात्र प्रचार कार्यक्रम में केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी (Nitin gadkari) ने एक भाषण दिया था. नागपुर के महापौर संदीप जोशी के एमएलसी चुनाव में पराजित होने के बाद वह सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रही है. गडकरी ने उस भाषण में स्पष्ट चेतावनी दी थी कि, ‘किसी ने भी सत्ता का माज (घमंड) नहीं करना चाहिए, जिसको भी घमंड आया, उसे जनता घर भेज देती है.’ इसके तुरंत बाद उन्होंने मंच पर बैठे बीजेपी के कई बड़े नेताओं की ओर देखते हुए कहा था कि, ‘मैं किसी के भी बारे में नहीं बोल रहा हूं.’ जानकार बताते हैं कि महाराष्ट्र प्रदेश बीजेपी के कई ऐसे नेता हैं जिन पर 2014-19 की सत्ता का उन्माद सिर चढ़कर बोल रहा है. गडकरी ने आगाह किया था, लेकिन कार्यकर्ता और नेता शायद समझ नहीं पाए. यही वजह है कि जो सीट कभी भी बीजेपी नहीं हारी, वहां पार्टी को 18,000 से ज्यादा वोटों से पराजित होने की शर्मनाक स्थिति का सामना करना पड़ा.

मोदी की देव-दिवाली की पूजा बेअसर

नागपुर ही नहीं, बनारस में भी एमएलएसी चुनाव (MLC Election) के ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने संसदीय क्षेत्र बनारस में देव-दिवाली मनाने पहुंचे थे. टीआरपी बढ़ाने वाली मीडिया ने उसका लाइव कवरेज किया. धार्मिक उन्माद की आड़ लेकर भारत को राष्ट्रवाद का हैवी-डोज पिलाने वाला हाई-टेक शो हुआ. लम्बा-चौड़ा भाषण भी दिया, लेकिन उसके बाद भी वहां एक एमएलएसी चुनाव में बीजेपी के समर्थन वाला प्रत्याशी जीत नहीं सका. जीत-हार तो चलती रहती है, लेकिन तीसरे नंबर पर पार्टी का जाना और बनारस में समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार जीतना, यह तो किसी भी भाजपाई को पचेगा नहीं. 

पढ़े-लिखे मतदाता छोड़ रहे पार्टी का साथ

इन चुनावों में दो विशेष बातें नजर आ रही हैं. यह चुनाव पढ़े-लिखे लोगों से संबंधित था. महाराष्ट्र हो या उत्तर प्रदेश, कुछ सीटें शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से थीं तो कुछ सीटें स्नातक निर्वाचन क्षेत्र वाली. इन सीटों पर बीजेपी का कब्जा इसलिए भी था क्योंकि जब असल मुद्दों पर पार्टी की राजनीति चलती थी, तब पढ़े-लिखे लोग उसके साथ हुआ करते थे. अब तो रोटी-कपड़ा-मकान, व्यापारी-किसान पर बीजेपी चर्चा तक नहीं करती. चर्चा करना तो छोड़, चर्चा करने वालों को देशद्रोही तक बता देती है. मीडिया के कुछ लोग और कुछ नट-नटिये उसकी गोदी में बैठे हैं, जिनकी लोकप्रियता की आड़ में मूल मुद्दों को परे रखकर समाज में बनावटी बहस छेड़ी जा रही है. सब कुछ बढ़िया चल रहा है. धार्मिक कट्टरवाद, अति-राष्ट्रवाद से लेकर लव-जिहाद जैसे मुद्दे जिस समाज या देश में सत्तारूढ़ दल अपनी प्राथमिकता पर रखे तो समझ लेना चाहिए कि देश की दिशा बिल्कुल भी सही नहीं चल रही है.

 जहां बैलेट, वहां बीजेपी फिर नदारद…

वैसे ईवीएम की ईमानदारी की बहस को बहुत ज्यादा तवज्जो देने की जरूरत नहीं महसूस की जाती है पर एक शंका हमेशा ही बनी रहती है कि आखिर जहां बैलेट पेपर होता है, वहां बीजेपी हारती क्यों है? यह सवाल सोशल मीडिया पर बहस का बड़ा मुद्दा है. लोग सवाल पूछते हैं कि पढ़े-लिखे लोग भी जब बैलेट से वोट डालकर बीजेपी को जीतने नहीं दे रहे हैं तो क्या सचमुच ईवीएम में कोई ‘लोचा’ है? हैदराबाद के निकाय चुनाव में भी बैलेट पेपर था, वहां भी अमित शाह, योगी आदित्यनाथ, जेपी नड्डा और टॅाप-लेवल के कई धुरंधर उतारने के बाद भी जीत नहीं पाना, मतलब सचमुच ईवीएम और बीजेपी का कोई तो भी ‘संदिग्ध-नाता’ है!

जल्द चेतें, कहीं ‘कांग्रेस’ जैसा हाल न कर दे पब्लिक 

वास्तव में देश की पब्लिक को डिजिटल ज्ञान अब इतना मिलने लगा है कि वह जितनी जल्दी सिर पर बिठाती है, उससे ज्यादा स्पीड से उतारकर फेंक देती है. बीजेपी को चाहिए कि वह असल मुद्दों को प्राथमिकता और ईमानदारी के साथ हल करे. 6 महीने का राशन लेकर दिल्ली की सड़कों पर डटे किसानों की मांग हो या नौकरी मांगता बेरोजगार, दो रोटी का जुगाड़ करता गरीब हो या अमेजन-फ्लिपकार्ट जैसी विदेशी कम्पिनयों से अपना कारोबार बचाता मंझौला दुकानदार, इनके दर्द को समझना होगा. रिलायंस और अदानी को अमीर करने से शायद किसी को उतना दुख न हो, लेकिन यदि गरीब की हालत नहीं सुधरी तो जो हाल देश की जनता ने कांग्रेस का किया है, वह बीजेपी का करते देर नहीं लगेगी.