राहुल गांधी की आस्था पैदल ही तय किया वैष्णो देवी का रास्ता

    पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘‘निशानेबाज, आस्था बड़ी चीज है. कहा गया है- आस्थावान लभते नर:। आस्था रखनेवाला व्यक्ति लाभान्वित होता है. किसी भी क्षेत्र में आस्था या कमिटमेंट का बड़ा महत्व है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व सांसद राहुल गांधी की आस्था घनीभूत हो गई और वे माता वैष्णोदेवी के दर्शन के लिए कटरा से पैदल ही मंदिर तक गए. उनके ध्यान में यह बात थी कि न हाथी है, न घोड़ा है, वहां पैदल ही जाना है.’’ 

    हमने कहा, ‘‘राहुल चाहते तो घोड़े या हेलीकॉप्टर से भी जा सकते थे लेकिन उनमें इतना पैदल चलने की क्षमता है. फिजिकल फिटनेस है तभी तो चढ़ाईवाले रास्ते पर इतना पैदल चले. उनके मन में ध्वनि गूंजी होगी- चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है.’’ पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, राहुल गांधी के पूर्वज जवाहरलाल नेहरू किसी मंदिर में नहीं जाते थे. वे बड़े बांधों और इस्पात कारखानों को ही आधुनिक भारत का मंदिर मानते थे. उनकी आस्था विकास के प्रति थी. दूसरी ओर राहुल की दादी इंदिरा गांधी मंदिर अवश्य जाती थीं लेकिन पुरी के जगन्नाथ मंदिर जाने पर वहां के पंडों ने यह कहकर उन्हें प्रवेश नहीं दिया था कि पारसी फिरोज गांधी से शादी के बाद वे हिंदू नहीं रहीं.

    जहां तक नेहरू की बात है उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद के सोमनाथ मंदिर जाने पर भी एतराज जताया था. वे चाहते थे कि राष्ट्रपति सार्वजनिक रूप से सेक्यूलर या धर्म के प्रति उदासीन रहें. राजेंद्रबाबू ने नेहरू की नहीं सुनी और सोमनाथ मंदिर गए थे.’’ हमने कहा, ‘‘राहुल गांधी ने कुछ वर्ष पूर्व खुद को दत्तात्रेय गोत्र का जनेऊधारी ब्राह्मण बताया था. वे मंदिर अवश्य जाते हैं. उनके पिता राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते अयोध्या की राम जन्मभूमि का ताला खुला था. अब वहां रामलला का भव्य मंदिर बन रहा है.’’ पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज कलियुग में धार्मिक आस्था रखना बड़ी बात है. प्रधानमंत्री मोदी भी कर्म के साथ धर्म निभाते हैं. आपको याद होगा कि उन्होंने केदारनाथ के दर्शन कर सर्व सुविधायुक्त गुफा में ध्यान लगाया था.’’