Uppar Wardha Dam Victims
दिलीप पंडागले, संजय दंडाले, अजाबराव कुमरे

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नागपुर. लगातार 205 दिनों से अपनी मांगों को लेकर मोर्शी में आंदोलन श्रृंखलाबद्ध अनशन कर रहे अप्पर वर्धा डैम के पीड़ित आखिर विधान भवन पर न्याय मांगने पहुंचे. इस मोर्चे में अधिकांश वृद्ध ही थे जो पिछले 40 वर्षों से शासन और प्रशासन के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे. इन आंदोलनकारियों में से एक कोपरा, उमरखेड़ निवासी 76 वर्षीय अजाबराव कुमरे ने बताया कि सरकार ने अचानक ही अप्पर वर्धा डैम का प्रकल्प शुरू किया. इस प्रकल्प से न केवल वर्धा बल्कि नागपुर और अमरावती के गांव भी प्रभावित हुए. प्रकल्प में मेरे परिवार की 8 एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर लिया गया. हम विरोध करते रहे लेकिन सरकार की तानाशाही के चलते गरीब किसानों को अपने घर और जमीन छोड़ कर दूसरी जगह विस्तापित होना पड़ा. मेरे परिवार को मुआवजे के तौर पर 715 रुपये दिए जा रहे थे. हमने यह रकम लेने से इंकार कर दिया. अपनी जमीन और घर के बदले मैं 715 रुपये क्यों लूं.

सरकार ने गरीब किसानों पर हिटलरशाही की. तब से अब तक हम न्याय मांग रहे हैं लेकिन अधिकारियों का कहना है कि 1970 के दशक के हिसाब से अपनी राशि लो. 1981 में डैम बनकर तैयार हो गया और हमें हमारी ही जमीन से बेदखल कर दिया गया. केदारनाथ कुमरे की भी यही कहानी है. उनकी भी 10 एकड़ जमीन सरकार ने अधिग्रहित की. पूरे परिवार का उदरनिर्वाह इसी जमीन पर था. लेकिन हमारे पुनर्वसन पर ध्यान नहीं दिया गया. सभी पार्टी के नेता वोट मांगने हमारे गांव में आते हैं. 3 महीने में मुआवजे की रकम दिलाने का वादा करते हैं और जीतने के बाद हम गरीबों को बीच मझधार में छोड़कर चले जाते हैं.

अपनी जमीन छोड़, दूसरे खेत में मजदूरी

सिरी गांव में रहने वाले दिलीप पंडागले ने बताया कि उनके पिता लक्ष्मण पंडागले की 3 एकड़ जमीन डैम के लिए अधिग्रहित की गई. कम मुआवजा लेने के लिए वो तैयार नहीं थे. सरकार ने पुलिस बल का प्रयोग कर हमारी जमीन और घर खाली करवा लिया. मेरे पिता 20 वर्षों तक अन्य किसानों के साथ आंदोलन करते रहे. मोर्चे निकाले लेकिन सरकार ने एक नहीं सुनी. केवल कुछ लोगों को मुआवजा दिया गया और पुनर्वसन किया गया. आखिर उनके पिता की मौत हो गई. अब 18 वर्षों से दिलीप आंदोलन में हिस्सा ले रहे हैं. दिलीप का कहना है कि खुद की जमीन होने के बावजूद मैं दूसरे के खेत में मजदूरी करके अपने परिवार का उदरनिर्वाह कर रहा हूं. जब तक हमें न्याय नहीं मिलेगा हम पीछे नहीं हटेंगे.

3 पीढ़ी से चल रहा आंदोलन

अमरावती जिले की मोर्शी तहसील के हिवरखेड़ में रहने वाले संजय दंडाले ने बताया कि डैम में उनकी 8 एकड़ जमीन गई. प्रशासन का कहना है कि इसके बदले हम 14 हजार रुपये का मुआवजा लें. पहले मेरे दादा घुलाजी दंडाले आंदोलन में सहभागी हुए. उनके बाद पिता जानराव ने कमर कसी. अब कई वर्षों से मैं आंदोलन और मोर्चों में सहभागी हो रहा हूं. मेरा पूरा परिवार मोर्शी में चल रहे श्रृंखलाबद्ध अनशन में शामिल है. हमारी 3 पीढ़ी सरकार से न्याय मांग चुकी है, लेकिन इस सरकार के कान में जूं नहीं रेंगती. गरीबों को न्याय देने की बजाय बड़े-बड़े उद्योगपतियों को जमीनें दी जा रही है. सरकार को हमारे पुनर्वसन और मुआवजे पर विचार करना चाहिए. सीएम एकनाथ शिंदे खुद प्रकल्प पीड़ित हैं. वे हमारी समस्याएं समझ सकते हैं, लेकिन प्रशासकीय अधिकारी हमें अपनी बात उन तक पहुंचाने नहीं देते.