जानें आज के दिन क्यों मनाया जाता है अंतर्राष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस, क्या है इसका उद्देश्य

    आज 23 सितंबर के दिन पुरे देश में  विश्व स्तर पर अंतर्राष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस (International Sign Language Day) मनाया जाता है। दुनिया भर में ऐसे कई लोग है, जो बोल या सुन नहीं सकते है। वह अपनी बात करने के लिए अपने हाथों से चेहरे के हाव-भाव से बात करते है। इस भाषा को सांकेतिक भाषा (Sign Language) कहा जाता है। अन्य भाषाओं की तरह सांकेतिक भाषा के भी व्याकरण और नियम होते है।

    सांकेतिक भाषा का विकास होना बहुत जरूरी है। क्योंकि यह भाषा मूक-बधिर लोगों की मातृभाषा है। हर साल सांकेतिक भाषा दिवस मनाने का उद्देश्य लोगों को साइन लैंग्वेज के बारे  में जागरूकता बढ़ाना और सांकेतिक भाषा को मजबूत बनाना है। इसलिए सितंबर का अंतिम पूरा सप्ताह  International Week of the Deaf यानी अंतरराष्ट्रीय बधिरता सप्ताह के रूप में मनाया जाता है।  

    अंतर्राष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस का इतिहास:

    1951 में 23 सितंबर को विश्व फेडरेशन ऑफ डेफ (World Federation of the Deaf) की याद में स्थापना की गई थी, जो जो बधिर लोगों के 135 राष्ट्रीय संघों का एक संघ है, जो दुनिया भर में लगभग 70 मिलियन बधिर लोगों के मानवाधिकारों को बढ़ावा देने काम करता है। बधिरों का अंतर्राष्ट्रीय सप्ताह पहली बार सितंबर 1958 में मनाया गया था और तब से यह बधिर एकता के एक वैश्विक आंदोलन के रूप में विकसित हो गया है। अंतर्राष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस पहली बार 2018 में अंतरराष्ट्रीय बधिरता सप्ताह के भाग के रूप में मनाया गया। यह दिन मनाने का उद्देश्य बधिर लोगों को उनके जीवन में आने वाले रोजमर्रा के मुद्दे के बारे में जागरूकता बढ़ाना है। 

    महत्व:

    सांकेतिक भाषा (Sign Languages) का प्रारंभिक प्रमाण 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व में प्लेटो की क्रेटीलस में मिलता है, जहां सुकरात कहते हैं कि “अगर हमारे पास आवाज या जुबान नहीं होती है, तो लोग एक-दूसरे से बात करने के लिए अपने विचार व्यक्त करना चाहते हैं तो क्या हम अपने हाथों, सिर और शरीर के अन्य अंगों द्वारा संकेत करने की कोशिश करते हैं।

    आज जैसा मूक लोग करते है। 1620 में जुआन पाब्लो बोनेट ने मेड्रिड में मूक-बधिर लोगों के संवाद को समर्पित पहली पुस्तक प्रकाशित की गई। इसके बाद 1680 में जॉर्ज डालगार्नो ने भी एक ऐसी ही पुस्तक प्रकाशित की।1755 में अब्बे डी लिपि ने Paris में बधिर बच्चों के लिए प्रथम विद्यालय की स्थापना की। 19वी सदी में अमेरिका तथा कुछ अन्य देशों में भी अनेक ऐसे स्कूलों की स्थापना होने लगी थी।