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    -सीमा कुमारी

    भगवान कार्तिकेय, जिन्हें दक्षिण भारत में भगवान मुरुगन के नाम से पूजा जाता है, उनकी पूजा हेतु हर महीने के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली ‘स्कंद षष्ठी’ तिथि को अति शुभ माना जाता है। आइए जानें स्कंद षष्ठ व्रत, पूजा-विधि, शुभ मुहूर्त और इसके धार्मिक महत्व के बारे में।

    हिंदू धर्म में हर तिथि को किसी न किसी देवी-देवता की साधना-आराधना के लिए शुभ माना जाता है। पंचांग के अनुसार हर महीने के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली षष्ठी तिथि को भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय की पूजा के लिए अत्यंत ही शुभ और मंगलकारी माना गया है।

    मान्यता है कि इस दिन भगवान कार्तिकेय की विधि-विधान से पूजा करने पर साधक को धन-धान्य आदि के साथ विशेष रूप से संतान सुख का आशीर्वाद प्राप्त होता है। सभी प्रकार की बाधा और शत्रुओं से बचाने वाले भगवान कार्तिकेय की पूजा के लिए समर्पित स्कंद षष्ठी 05 जुलाई को है।

    भगवान कार्तिकेय

    सनातन परंपरा में जिस भगवान स्कंद कुमार (कार्तिकेय) देवी-देवताओं का सेनापति माना गया है. दक्षिण भारत में इन्हें लोग ‘मुरुगन’ के नाम से पूजते हैं। माता पार्वती और भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय से जुड़े स्कंद षष्ठी व्रत को दक्षिण भारत में विशेष रूप से किया जाता है, जिसे महिलाएं अपने पुत्र की लंबी आयु और सुख-समृद्धि की चाह लिए रखती हैं।

    व्रत का शुभ मुहूर्त

    पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में स्कंद षष्ठी तिथि 04 जुलाई 2022 को सायंकाल 06:32 बजे से प्रारंभ होकर 05 जुलाई 2022 को सायंकाल 07:28 बजे तक रहेगी।

    पूजा-विधि

    स्कंद षष्ठी के पावन अवसर पर भगवान कार्तिकेय से मनचाहा आशीर्वाद पाने के लिए साधक को प्रात:काल सूर्योदय से पहले उठकर स्नान-ध्यान करना चाहिए। इसके पश्चात भगवान सूर्य नारायण को अर्घ्य देने के बाद भगवान कार्तिक की फल, फूल, दही, शहद, चंदन, धूप, दीपक आदि के माध्यम से विधिपूर्वक पूजा करें। भगवान कार्तिकेय की पूजा में मोरपंख अवश्य चढ़ाएं। स्कंद षष्ठी व्रत में दिन भर में एक बार फलहार का नियम होता है। भगवान कार्तिकेय का आशीर्वाद पाने के लिए स्कंद षष्ठी की पूजा में –

    मंत्र का उच्चारण करें।

    देव सेनापते स्कंद कार्तिकेय भवोद्भव।

    कुमार गुह गांगेय शक्तिहस्त नमोस्तु ते॥

    धार्मिक महत्व

    पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान स्कंद कुमार ने ‘स्कंद षष्ठी’ वाले दिन ही तारकासुर का वध किया था। पौराणिक मान्यता के अनुसार स्कंद षष्ठी की साधना करने पर ही च्यवन ऋषि को नेत्र ज्योति प्राप्त हुई थी। भगवान मुरुगन का आशीर्वाद दिलाने वाले इस व्रत के बारे में मान्यता है कि इस व्रत को करने पर जीवन से जुड़े बड़े बसे बड़े शत्रु पर विजय प्राप्त होती है। यह व्रत निसंतान लोगों के लिए वरदान माना जाता है, जिसे करने पर उन्हें शीघ्र ही संतान सुख प्राप्त होता है।