हर समय चुनाव ही चुनाव जनता के कार्य अधूरे पड़े रहते हैं

    भारत चुनावों का देश है. यहां ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि सारे चुनाव एक साथ निपटा लिए जाएं जिससे सरकार काम से लग जाए और जनता भी निश्चिंत हो जाए, इसके अलावा प्रशासन भी अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने में समर्थ हो. आश्चर्य है कि इस सार्थक दिशा को लेकर कोई सोचता ही नहीं. इसे व्यवस्था की खामी कहा जा सकता है कि ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया गया. कभी भारत को ‘कृषि प्रधान’ देश की उपमा दी जाती थी लेकिन अब लगातार चुनाव होते रहने की वजह से सहज ही ‘चुनाव प्रधान’ देश कहा जा सकता है.

    राज्यसभा और महाराष्ट्र विधान परिषद चुनाव का दौर निपटने के बाद अगले माह राष्ट्रपति पद का महत्वपूर्ण चुनाव है. बेशक लोकतंत्र के लिहाज से चुनाव आवश्यक हैं किंतु इसका यह मतलब नहीं कि हर वर्ष या कुछ महीनों के अंतराल पर देश में कहीं न कहीं चुनाव होता रहे! इससे शासन तंत्र में अनावश्यक व्यवधान तथा जरूरी कार्यों और प्रगति में बाधा आती है.

    देश में लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा, विधान परिषद, नगर निगम, नगर परिषद, जिला परिषद, पंचायत का निर्वाचन होता रहता है. समय-समय पर उपचुनाव भी हुआ करते हैं. इस तरह हर वक्त चुनावी माहौल बना रहता है. यद्यपि लोकसभा व विधानसभा का 5 वर्ष का कार्यकाल निर्धारित है परंतु राज्यसभा और विधान परिषदों का कार्यकाल 6 वर्ष होता है, जिनकी एक-तिहाई सीटों के लिए हर 2 वर्ष में चुनाव कराए जाते हैं. नगर निगम का चुनाव 5 वर्ष में होता है लेकिन महापौर हर वर्ष नया चुना जाता है.

    जहां तक उपचुनावों की बात है, किसी सदस्य का निधन होने या इस्तीफा देने से उस सीट पर 6 माह के भीतर उपचुनाव कराना अपरिहार्य हो जाता है. कभी ऐसा भी होता है कि कोई नेता 2 सीटों पर चुनाव लड़कर दोनों से जीत जाता है. ऐसे में उसे एक सीट खाली करनी पड़ती है. तब वहां 6 माह के अंदर उपचुनाव कराना जरूरी हो जाता है. कभी किसी ऐसे व्यक्ति को राज्य का मुख्यमंत्री या मंत्री बना दिया जाता है जो किसी भी सदन का सदस्य नहीं है, उसे भी 6 माह के भीतर चुनाव जीतकर किसी सदन की सदस्यता हासिल करनी पड़ती है. इस प्रकार चुनावों का दौर निरंतर चलता ही रहता है.

    लोक कल्याण की फुरसत मिले भी तो कैसे!

    लगातार चुनाव होते रहने से नेताओं का दिमाग उसी में उलझा रहता है. उनको चुनावी बिसात बिछाने, उम्मीदवार का चयन करने, अन्य पार्टियों से गठबंधन या तालमेल करने, रणनीति बनाने से फुरसत नहीं मिलती. चुनावी रैलियों, रोड शो में व्यस्त नेताओं को जनहित के कार्यों के लिए समय ही नहीं रहता. उनकी पहली फिक्र अपनी पार्टी को मजबूत बनाने और किसी भी कीमत पर चुनावी जीत हासिल करने पर केंद्रित रहती है. कितने ही नेता अपना आधार मजबूत करने के लिए पहले पंचायत या नगरपालिका का चुनाव जीतने पर जोर लगा देते हैं और फिर प्रभाव बढ़ जाने के बाद विधानसभा का चुनाव लड़ते हैं. चुनाव उनके लिए प्राथमिकता है, जनसेवा की बारी बाद में आती है.

    अफसरशाही व्यवस्था मेंलगी रहती है

    चुनाव के समय आचार संहिता लागू होने से प्रशासनिक कामकाज ठप पड़ जाता है. कोई नीतिगत निर्णय नहीं लिए जाते. अफसरशाही का पूरा ध्यान चुनाव कराने पर केंद्रित रहता है. सिविल प्रशासन और पुलिस की ड्यूटी इन्हीं कार्यों में लगी रहती है. लोक कल्याण से जुड़े कार्य आधे-अधूरे पड़े रहते हैं. शिक्षातंत्र भी पंगु होकर रह जाता है क्योंकि शिक्षकों को चुनावी ड्यूटी में लगा दिया जाता है. सरकार चाहे तो इन सारे पहलुओं पर विचार कर सभी चुनाव एक साथ कराने पर विचार करे, जिससे अनावश्यक खर्च पर अंकुश लगेगा. बार-बार मतदाता सूची बनाने, मतदान केंद्रों का इंतजाम करने, सुरक्षा बलों की तैनाती करने, हर समय रैली व रोड शो करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. ऐसी सुचारू व्यवस्था बनाई जाए कि जनता के कार्यों को प्राथमिकता मिले.