अपने प्राचीन मंदिरों और उन पर उकेरी गईं अद्भुत मूर्तियों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध खजुराहो में एक हजार साल पुराने कई मंदिर हैं। ये मंदिर इतने भव्य और विशाल हैं कि इन्हें देखने के बाद हैरानी हो सकती है कि उस जमाने में इनका निर्माण किस प्रकार किया गया होगा। चंदेल वंश के राजाओं द्वारा बनवाए 85 मंदिरों में से आज वहां करीब 25 मंदिर मौजूद हैं। 
 
क्यों कहा जाता है प्रेम के देवता?
यद्यपि ये तमाम मंदिर पूजा-अर्चना के उद्देश्य से बनवाए ही नहीं गए थे। पूजा-पाठ के मकसद से सिर्फ एक मतंगेश्वर मंदिर का निर्माण किया गया था, जिसमें आज भी नियम से पूजा होती है। किंतु अन्य मंदिरों में भी आपको चढ़ावा चढ़ाते कई लोग दिख जाएंगे। मान्यता है कि खजुराहो ही वह स्थान है, जहां भगवान शिव का विवाह संपन्न हुआ था। मतंग यानी प्रेम के देवता को ही मतंगेश्वर कहा गया है।
 
9वीं शताब्दी में ऐसे बना यह मंदिर
नौवीं शताब्दी में शिवभक्त चंदेल राजा चंद्र देव के बनवाए इस मंदिर को मध्य प्रदेश के सबसे पुराने मंदिरों में शुमार जाता है। खजुराहो के सभी मंदिरों में सबसे पवित्र माने जाने वाले इस मंदिर के स्तंभ और दीवारों पर यहां के बाकी मंदिरों की तरह मूर्तियां आदि नहीं उकेरी गई हैं। इस मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण है इसके अंदर स्थित करीब ढाई मीटर ऊंचा शिवलिंग, जिसका व्यास एक मीटर से भी ज्यादा है।
 
शिवलिंग को लेकर यह है कथा
इस शिवलिंग को लेकर कई तरह की कथाएं यहां कही-सुनी जाती हैं। यहां मौजूद पुजारी बताते हैं कि यह शिवलिंग जितना दिखाई देता है, उससे ज्यादा यह जमीन में दबा है। यह भी कहा जाता है कि राजा चंद्र देव को अपने राज्य की सुरक्षा के लिए एक ‘मरकत मणि’ मिली थी, जो इस शिवलिंग के नीचे दबी हुई है। मान्यता है कि इस शिवलिंग को छूकर सच्चे हृदय से की गई कामना को भगवान शिव अवश्य पूरी करते हैं। यह मंदिर खजुराहो के तीन मंदिर समूहों में से सबसे विशाल और प्रसिद्ध पश्चिमी मंदिर समूह के गेट के पास ही स्थित है, जिसके सामने खजुराहो का प्राचीन तालाब भी है। 
 
कैसे पहुंचें
खजुराहो जाने के लिए दिल्ली से सीधी ट्रेन और हवाई सुविधा उपलब्ध है।